शिमला, 25 मार्च: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ग्राम पंचायत घुरट के विभाजन और नई ग्राम सभा के गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य चुनाव आयोग को भी प्रतिवादी के रूप में शामिल करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला अब सिर्फ एक पंचायत तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि पंचायत पुनर्गठन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है।
मामले की सुनवाई मंगलवार को न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ के समक्ष हुई। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि नई ग्राम सभा का गठन और पंचायतों का पुनर्गठन कानून के प्रावधानों के तहत ही किया गया था।
लेकिन अदालत ने इस चरण पर सरकार के रिकॉर्ड को पूरी तरह पर्याप्त नहीं माना। उपायुक्त शिमला की ओर से पेश दस्तावेजों को देखने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं है कि पंचायतों के विभाजन या पुनर्गठन का प्रस्ताव आखिर शुरू कहां से हुआ था। यही बिंदु सुनवाई का अहम हिस्सा बन गया।
अदालत ने पूछा, प्रस्ताव की शुरुआत कहां से हुई?
यह मामला केवल एक प्रशासनिक आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात से जुड़ा है कि पंचायतों की सीमाओं, ग्राम सभाओं और स्थानीय प्रशासनिक ढांचे में बदलाव किस प्रक्रिया से किए गए।
याचिका में ग्राम पंचायत घुरट के विभाजन और नई ग्राम सभा के गठन को चुनौती दी गई है। अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि वह इस पूरे फैसले की प्रशासनिक पृष्ठभूमि और प्रक्रिया को विस्तार से समझना चाहती है।
क्योंकि सरकार की ओर से पेश रिकॉर्ड इस स्तर पर पूरी तस्वीर नहीं दे सका, इसलिए राज्य सरकार ने अदालत से विस्तृत रिकॉर्ड पेश करने के लिए समय मांगा। अदालत ने यह मांग स्वीकार कर ली।
कानूनी जानकारों का मानना है कि राज्य चुनाव आयोग को पक्षकार बनाने का मतलब यह भी है कि अदालत पंचायत सीमांकन और चुनावी ढांचे पर पड़ने वाले असर को गंभीरता से देख रही है।
कई याचिकाओं पर एक साथ होगी सुनवाई
ग्राम पंचायत घुरट का मामला अकेला नहीं है। पंचायतों के पुनर्गठन और विलय को लेकर कई अन्य याचिकाएं भी हाईकोर्ट में लंबित हैं, जिससे साफ है कि यह मुद्दा राज्य के अलग-अलग हिस्सों में विवाद का कारण बना हुआ है।
खंडपीठ ने संकेत दिया है कि इन सभी याचिकाओं पर बुधवार को एक साथ सुनवाई होगी। इससे यह मामला गांव-स्तर के विवाद से आगे बढ़कर व्यापक प्रशासनिक और कानूनी बहस का रूप ले सकता है।
इस सुनवाई का असर भविष्य में पंचायत सीमांकन, ग्राम सभा गठन और स्थानीय निकायों की प्रशासनिक संरचना से जुड़े फैसलों पर भी पड़ सकता है।
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