मुंबई, 22 अप्रैल 2026
ईरान के साथ सीजफायर की अवधि बढ़ाने के बावजूद वैश्विक शेयर बाजारों में मंगलवार को गिरावट देखने को मिली। यह साफ संकेत है कि निवेशकों को अस्थायी राहत तो मिली है, लेकिन भरोसा अभी भी नहीं लौटा है।
अमेरिका में प्रमुख सूचकांकों ने गिरावट दर्ज की। डॉव जोन्स 1.2% टूटा, जबकि S&P 500 में 0.9% और नैस्डैक में 0.7% की कमजोरी आई।
एशिया में भी यही रुझान रहा। जापान का निक्केई 1.5% गिरा, और भारत का सेंसेक्स 1.8% नीचे आया, जो वैश्विक स्तर पर फैली अनिश्चितता को दर्शाता है।
राहत मिली, लेकिन भरोसा नहीं बना
मार्च में शुरू हुआ सीजफायर अब 30 दिनों के लिए बढ़ा दिया गया है। इससे युद्ध का तत्काल खतरा टला है, लेकिन असली मुद्दे अब भी हल नहीं हुए हैं।
“यह सिर्फ समय खरीदने जैसा है। असली समस्याएं—तेल आपूर्ति, प्रतिबंध और क्षेत्रीय तनाव—अब भी बनी हुई हैं,” अर्थशास्त्री राहुल मेहता ने कहा।
तेल और सप्लाई चेन बने सबसे बड़े जोखिम
ब्रेंट क्रूड की कीमतें पहले $95 प्रति बैरल तक पहुंचीं, जो अब करीब $88 पर हैं, लेकिन इसमें उतार-चढ़ाव जारी है।
इसके साथ ही:
- होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग जोखिम
- रेड सी रूट पर सप्लाई चेन दबाव
- महंगाई पर दोबारा असर की आशंका
ये सभी कारक वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
बाजार ‘इंतजार’ की स्थिति में
यूरोप में भी गिरावट देखी गई। Euro Stoxx 50 में 1.1% और FTSE 100 में 0.8% की कमी दर्ज हुई।
“फिलहाल बाजार इंतजार कर रहे हैं। राहत तो है, लेकिन भरोसा नहीं,” विश्लेषक अंजलि कपूर ने कहा।
भारत में रुपया भी कमजोर होकर 83.45 प्रति डॉलर तक पहुंच गया।
आर्थिक जोखिम के साथ बढ़ता राजनीतिक दबाव
वैश्विक स्तर पर सरकारें सतर्क हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ अस्थायी समाधान है।
ईरान में भी आर्थिक दबाव बढ़ रहा है, जहां महंगाई और बेरोजगारी को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी हैं।
बड़ी तस्वीर (The Bigger Picture)
सीजफायर का बढ़ना राहत जरूर देता है, लेकिन बाजार सिर्फ वर्तमान नहीं—भविष्य के जोखिमों को देख रहे हैं।
तेल की कीमतें, सप्लाई चेन और वैश्विक राजनीति—तीनों मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं जहां अनिश्चितता ही सबसे बड़ा फैक्टर बन गई है।
आने वाले हफ्तों में यह तय होगा कि यह सिर्फ अस्थायी विराम है या किसी बड़े समाधान की शुरुआत।
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