शिमला, 22 मार्च: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शनिवार को हिमाचल प्रदेश का वर्ष 2026–27 का बजट पेश किया। ₹54,928 करोड़ के इस बजट में सरकार ने विकास और कल्याण योजनाओं का खाका तो रखा है, लेकिन इसके साथ राज्य की वित्तीय स्थिति की असली तस्वीर भी सामने आ गई है।
पहली नजर में यह बजट रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और कल्याण योजनाओं से भरपूर लगता है, लेकिन असली कहानी इसके आंकड़ों में छिपी है। सरकार की अनुमानित आय ₹40,361 करोड़ है, जबकि खर्च ₹46,938 करोड़ तक पहुंचने वाला है। यानी सीधा-सीधा ₹6,577 करोड़ का घाटा।
यही वजह है कि इस बार सरकार को कई कड़े फैसले लेने पड़े हैं। कुल बजट में ₹3,586 करोड़ की कटौती की गई है और मुख्यमंत्री ने खुद स्वीकार किया कि केंद्र से मिलने वाली सहायता में कमी ने राज्य की वित्तीय स्थिति पर सीधा असर डाला है।
पैसा कहां खर्च होगा
वित्तीय दबाव के बावजूद सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जरूरी क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है। स्कूलों और अस्पतालों में खाली पद भरने और सुविधाएं सुधारने की बात कही गई है, खासकर ग्रामीण इलाकों पर ध्यान दिया गया है।
रोजगार को लेकर भी सरकार सक्रिय दिखी। 870 पीईटी भर्ती इसका एक उदाहरण है, जिसमें ₹21,500 मासिक मानदेय तय किया गया है। हालांकि सवाल यह भी है कि क्या यह कदम राज्य के बड़े रोजगार संकट को कम करने के लिए काफी होगा।
कृषि और बागवानी, खासकर सेब उद्योग, इस बजट का अहम हिस्सा हैं। सिंचाई योजनाएं, फसल विविधीकरण और बीज उत्पादन के लिए सहायता जैसी घोषणाएं की गई हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की कोशिश है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यटन में भी सरकार ने बड़ा दांव खेला है। कांगड़ा एरोसिटी परियोजना के लिए करीब ₹3,300 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव इस दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
कल्याण योजनाएं बनाम आर्थिक दबाव
सरकार ने महिलाओं, गरीब परिवारों और जरूरतमंद वर्गों के लिए योजनाएं जारी रखने का फैसला किया है। यह दिखाता है कि सरकार सामाजिक योजनाओं में कटौती नहीं करना चाहती।
लेकिन इसके साथ ही राजस्व बढ़ाने की जरूरत भी साफ दिखाई देती है। पेट्रोल-डीजल पर ₹5 प्रति लीटर तक सेस लगाने का प्रस्ताव इसी का हिस्सा है। सरकार इसे जरूरी कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ मान रहा है।
कर्ज का बोझ और सीमित विकल्प
हिमाचल प्रदेश पर ₹80,000 करोड़ से अधिक का कर्ज है। ब्याज भुगतान, वेतन और पेंशन मिलकर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च कर देते हैं।
इसका सीधा असर यह होता है कि विकास के लिए सीमित पैसा बचता है। यानी सरकार को हर खर्च सोच-समझकर करना पड़ता है।
स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने कुछ सख्त कदम भी उठाए हैं, जैसे मुख्यमंत्री और मंत्रियों के वेतन का हिस्सा कुछ समय के लिए स्थगित करना। यह कदम आर्थिक रूप से बड़ा नहीं है, लेकिन संदेश जरूर देता है कि हालात आसान नहीं हैं।
आगे की राह
यह बजट सिर्फ घोषणाओं का नहीं, बल्कि संतुलन बनाने की कोशिश का बजट है।
अब असली सवाल यह है कि क्या सरकार इन योजनाओं को जमीन पर उतार पाएगी और साथ ही वित्तीय स्थिति को भी संभाल पाएगी।
आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि हिमाचल बजट 2026 को सफल माना जाएगा या नहीं।
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