बांग्लादेश की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ पुराने चेहरे गायब हैं और नए समीकरण बन रहे हैं। इस बदलते दौर में सबसे ताकतवर बनकर उभरे हैं डॉ. शफीकुर रहमान। जमात-ए-इस्लामी के इस अमीर (प्रमुख) को उनके समर्थक प्यार से ‘दादू’ कहते हैं। सफेद दाढ़ी और बेहद शांत लहजे में बात करने वाले रहमान आज उस मुकाम पर हैं कि विदेशी राजदूतों से लेकर स्थानीय छात्र नेताओं तक, हर कोई उनसे मुलाकात का समय मांग रहा है।
एक समय था जब शेख हसीना की सरकार ने उनकी पार्टी पर ताला लगा दिया था और उनके नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया था। लेकिन 2024 की ‘जुलाई क्रांति’ ने सब कुछ बदल दिया। अब शफीकुर रहमान अपनी पार्टी को एक ‘आधुनिक और लोकतांत्रिक’ ताकत के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने इस बार एक ऐसा दांव चला है जिसने सबको चौंका दिया—उनकी पार्टी ने पहली बार हिंदू उम्मीदवारों को टिकट दिया है। रहमान खुद मंदिरों में जा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनके राज में किसी हिंदू को भारत भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
हालांकि, शफीकुर रहमान की राह इतनी भी आसान नहीं है। हाल ही में महिलाओं के नेतृत्व को लेकर दिए गए उनके बयानों ने विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि इस्लाम में महिलाओं को लीडरशिप देने की इजाजत नहीं है। इस बयान के बाद जहाँ एक तरफ महिला संगठन उनसे नाराज हैं, वहीं उनके समर्थक इसे ‘सिद्धांतों की राजनीति’ बता रहे हैं।
भारत के नजरिए से भी रहमान की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने संकेत दिया है कि वे पड़ोसियों के साथ “रचनात्मक संबंध” चाहते हैं, लेकिन साथ ही वे ‘भारत छोड़ो’ (India Out) जैसे अभियानों का समर्थन करने वाले गुटों के भी करीब हैं।
12 फरवरी को होने वाले चुनाव सिर्फ एक सरकार नहीं चुनेंगे, बल्कि यह तय करेंगे कि डॉ. शफीकुर रहमान का ‘नया बांग्लादेश’ कितना उदार होगा। क्या वे वास्तव में अल्पसंख्यकों और युवाओं के मसीहा बनेंगे या फिर पुराने कट्टरपंथी ढर्रे पर ही लौट जाएंगे? फिलहाल तो ढाका की सड़कों पर सिर्फ ‘दादू’ के ही चर्चे हैं।
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