नई दिल्ली | एनॉक्स न्यूज़ — अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आपातकालीन टैरिफ अधिकारों पर रोक लगा दी है। इस 6-3 के बहुमत वाले फैसले ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है, लेकिन भारतीय निर्यातकों के लिए यह एक बड़ी राहत की खबर लेकर आया है। कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति ने 1977 के ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट’ (IEEPA) का इस्तेमाल करके व्यापारिक भागीदारों पर एकतरफा आयात शुल्क लगाकर अपने संवैधानिक अधिकारों का भारी उल्लंघन किया है।
भारत के लिए इस अदालती फैसले का सीधा मतलब यह है कि हाल ही में एक अंतरिम व्यापार समझौते के तहत तय किया गया 18 प्रतिशत का ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ अब अमान्य हो गया है। हालांकि, यह राहत कुछ नई शर्तों के साथ आई है।
सुप्रीम कोर्ट के इस झटके के कुछ ही घंटों बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक और दांव चलते हुए 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का इस्तेमाल किया। इसके तहत उन्होंने 24 फरवरी से सभी आयातों पर 150 दिनों के लिए अस्थायी रूप से 10 प्रतिशत का नया ‘ग्लोबल टैरिफ’ लागू करने की घोषणा कर दी।
व्यापार विश्लेषकों का मानना है कि इस नए घटनाक्रम से भारत को फायदा होगा। IEEPA के तहत लगाए गए भारी शुल्कों के हटने के बाद, अब भारतीय सामानों पर यह नया 10 प्रतिशत का ग्लोबल टैरिफ और लगभग 3.5 प्रतिशत का ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) शुल्क लगेगा। इस तरह भारत के लिए प्रभावी टैरिफ घटकर करीब 10 से 13.5 प्रतिशत के बीच रह जाएगा, जो कि पहले के 18 प्रतिशत से काफी कम है।
इस कटौती से भारत के निर्यात बाजार को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है, जिसका अमेरिकी बाजार में पिछले साल का आंकड़ा 103 अरब डॉलर से अधिक था। अमेरिका पर निर्भर रहने वाले कपड़ा, चमड़ा, आभूषण और फार्मास्युटिकल जैसे क्षेत्रों को इसका सबसे ज्यादा लाभ मिलेगा। जानकारों के अनुसार, भारत के लगभग 55 प्रतिशत निर्यात अब 18 फीसदी की भारी ड्यूटी से मुक्त हो जाएंगे। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि स्टील और एल्युमिनियम जैसे उत्पादों पर धारा 232 के तहत लगाए गए 50 प्रतिशत के क्षेत्रीय टैरिफ पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा।
इस कानूनी हार के बावजूद वाशिंगटन का रुख सख्त है। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि नई दिल्ली के साथ व्यापार समझौता अपने ट्रैक पर है। ट्रंप ने कहा, “कुछ नहीं बदला है। वे टैरिफ चुकाते रहेंगे और हम नहीं चुकाएंगे।” इसके साथ ही उन्होंने भारत के साथ अपने संबंधों को ‘शानदार’ बताया और रूसी तेल की खरीद कम करने के लिए भारत की तारीफ भी की।
इधर, नई दिल्ली में भारत सरकार इस पूरे मामले पर सावधानी से कदम रख रही है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि वे इन तेज बदलावों पर कड़ी नजर रख रहे हैं। मंत्रालय ने कहा, “हमने टैरिफ पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गौर किया है… हम इन सभी घटनाक्रमों और उनके प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं।”
आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल के वाशिंगटन जाने की उम्मीद है। भले ही अमेरिकी प्रशासन ऊंचे टैरिफ को वापस लाने के लिए नए कानूनी रास्ते तलाश रहा हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने व्यापार वार्ता की दिशा बदल दी है, जिससे नई दिल्ली को मोलभाव करने का एक मजबूत मौका मिल गया है।
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