नई दिल्ली, 30 मार्च: भारतीय रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95 के पार फिसल गया और इतिहास में पहली बार इस स्तर को तोड़ते हुए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, विदेशी मुद्रा बाजार में तनाव और वैश्विक जोखिम से बचने की धारणा ने रुपये पर भारी दबाव डाला। कई रिपोर्टों के मुताबिक, रुपया दिन के दौरान करीब 95.21–95.22 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक चला गया।
यह गिरावट ऐसे दिन आई जब भारतीय वित्तीय बाजारों पर पहले से ही दबाव बना हुआ था। सेंसेक्स और निफ्टी में तेज गिरावट दर्ज हुई, कच्चे तेल की कीमतें फिर उछलीं और निवेशकों में यह चिंता बनी रही कि पश्चिम एशिया तनाव भारत के लिए ऊर्जा लागत, महंगाई और बाहरी आर्थिक संतुलन पर कितना भारी पड़ सकता है। ब्रेंट क्रूड 116 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया, जिससे भारत जैसी तेल आयातक अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ गया।
रुपये की यह ताजा कमजोरी कोई एक-दिन की घटना नहीं है, बल्कि मार्च के दौरान बढ़ते दबाव का नतीजा है। रॉयटर्स ने कहा है कि रुपया 2011–12 के बाद अपने सबसे खराब वित्त वर्ष की ओर बढ़ रहा है, जबकि मार्च महीना खुद हाल के वर्षों में भारतीय मुद्रा बाजार के सबसे अस्थिर दौरों में शामिल हो चुका है। शुक्रवार तक ही रुपया मार्च में 4% से ज्यादा टूट चुका था, और सोमवार की नई गिरावट ने स्थिति को और नाजुक बना दिया।
RBI के कदमों के बावजूद रुपया इतनी तेजी से क्यों टूटा
इस गिरावट को और अहम इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की कोशिशों के बावजूद हुई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, RBI ने हाल ही में बैंकों के लिए फॉरेक्स पोजिशन लिमिट्स को कड़ा किया था, ताकि सट्टा दबाव कम हो और डॉलर पर बने बड़े दांव कुछ हद तक कम किए जा सकें। लेकिन इससे मिली राहत ज्यादा देर टिक नहीं सकी।
असल में RBI की यह कार्रवाई बाजार को पूरी तरह शांत करने के बजाय थोड़े समय के लिए और असंतुलित भी कर गई। रॉयटर्स के मुताबिक, इस कदम के बाद भारत के घरेलू डॉलर-रुपया बाजार और ऑफशोर नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड (NDF) बाजार के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया। इससे कुछ कंपनियों और बाजार प्रतिभागियों को घरेलू बाजार में सस्ता डॉलर खरीदकर ऑफशोर बाजार में ऊंचे भाव पर बेचने का मौका मिल गया।
इसका मतलब यह हुआ कि केंद्रीय बैंक की स्थिरता लाने की कोशिश को बाजार की चाल ने काफी हद तक कमजोर कर दिया। रॉयटर्स ने कहा कि ऐसे बने हुए पोजिशन का आकार करीब 25 अरब डॉलर से 50 अरब डॉलर से अधिक तक हो सकता है। जब ये ट्रेड खुलने और बंद होने लगे, तो उतार-चढ़ाव और बढ़ गया।
रुपये के खिलाफ व्यापक आर्थिक माहौल भी फिलहाल अनुकूल नहीं है। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में हर बड़ा उछाल देश के आयात बिल, महंगाई, चालू खाते और राजकोषीय दबाव को लेकर चिंता बढ़ा देता है। यही वजह है कि तेल झटका रुपये पर बहुत तेजी से असर डालता है।
यह सिर्फ करेंसी ट्रेडरों की कहानी नहीं, आम लोगों पर भी असर पड़ेगा
कमजोर रुपया सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। अगर यह दबाव जारी रहता है, तो इसका असर ईंधन लागत, आयातित महंगाई, यात्रा खर्च, कंपनियों के मार्जिन और घरेलू बजट तक जा सकता है। और जब तेल की कीमतें पहले से ऊंची हों, तब गिरता रुपया हर आयातित बैरल को भारतीय मुद्रा में और महंगा बना देता है।
आम लोगों को इसका असर शुरुआत में “करेंसी संकट” के रूप में शायद न दिखे। लेकिन यह धीरे-धीरे दूसरी जगहों पर दिखाई देता है — कंपनियों के इनपुट कॉस्ट बढ़ते हैं, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स महंगे होते हैं, आयातित सामान की कीमतें बढ़ती हैं और समय के साथ महंगाई का दबाव रोजमर्रा के खर्चों तक पहुंच सकता है।
निवेशकों के लिए भी सोमवार की चाल एक बड़ा संकेत है। यह बताती है कि बाजार अब सिर्फ छोटे समय की खबरों पर नहीं, बल्कि भारत के लिए एक कठिन बाहरी आर्थिक माहौल की आशंका पर प्रतिक्रिया दे रहा है — खासकर अगर तेल ऊंचा बना रहता है और वैश्विक जोखिम लेने की इच्छा कमजोर रहती है। भारतीय शेयर बाजारों में भी यही दबाव दिखा, जहां बेंचमार्क सूचकांकों ने कोविड दौर के बाद अपने सबसे खराब मार्च महीनों में से एक दर्ज किया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या RBI के समर्थन से रुपया स्थिर होगा, या 95 प्रति डॉलर अब नया दबाव वाला स्तर बन जाएगा। फिलहाल बाजार का संदेश साफ है: भारतीय मुद्रा कई वर्षों के सबसे गंभीर दबाव में है, और वैश्विक हालात नीति-निर्माताओं की सहज पकड़ से तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।
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