गोमा (कांगो): सात समुंदर पार वॉशिंगटन के वातानुकूलित (AC) कमरों में जब दुनिया के बड़े नेता हाथ मिलाते हैं, तो कांगो के पूर्वी इलाकों में रहने वाले मजदूर सिहर उठते हैं। अमेरिका और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) के बीच खनिजों को लेकर एक नई ‘रणनीतिक साझेदारी’ शुरू हुई है, लेकिन गोमा की धूल भरी सड़कों पर इस दोस्ती का जश्न नहीं, बल्कि मातम जैसा माहौल है।
यहाँ के लोगों के लिए यह कहानी नई नहीं है। सदियों से उनकी जमीन ‘सोने की चिड़िया’ रही है, लेकिन उस सोने ने उन्हें कभी अमीर नहीं बनाया।
वॉशिंगटन के वादे बनाम गोमा की हकीकत
बुधवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने वॉशिंगटन में ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ की मेजबानी की। एजेंडा साफ था—इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और रक्षा उपकरणों के लिए जरूरी कोबाल्ट और तांबे की सप्लाई पर चीन के दबदबे को खत्म करना। अमेरिका के लिए यह एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ है, लेकिन कांगो के 28 वर्षीय छात्र जेराड बुंडा के लिए यह चिंता का विषय है।
“हम खनिज निकालने में सिर्फ शोषित होते हैं,” बुंडा कहते हैं। उनकी आवाज में गुस्सा और बेबसी दोनों है। “विदेशी निवेशक आते हैं, हमें हमारी ही जमीनों से खदेड़ देते हैं और फिर हमसे अपनी शर्तों पर मजदूरी करवाते हैं। यह विकास नहीं, यह आधुनिक गुलामी है।”
जेराड की यह चिंता बेबुनियाद नहीं है। ‘लोबिटो कॉरिडोर’ (Lobito Corridor)—जो एक रेलवे प्रोजेक्ट है और जिसे अमेरिका कांगो के खनिजों को अटलांटिक तट तक पहुंचाने के लिए तैयार कर रहा है—स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत बन सकता है। ग्लोबल विटनेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस रेल पटरी के लिए करीब 6,500 लोगों को बेघर किया जा सकता है। सवाल वही है: क्या यह रेलगाड़ी कांगो की तरक्की लाएगी या सिर्फ वहां की दौलत बाहर ले जाएगी?

‘अमीर धरती, गरीब लोग’ का अभिशाप
कांगो दुनिया के सबसे अमीर खनिज भंडारों में से एक है, फिर भी इसके लोग दुनिया के सबसे गरीबों में गिने जाते हैं। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘संसाधन का अभिशाप’ (Resource Curse) कहा जाता है।
केन्या स्थित विश्लेषक कोको ब्यूरोको ग्लोयर का मानना है कि अमेरिका और चीन की इस भू-राजनीतिक (geopolitical) लड़ाई में कांगो सिर्फ एक ‘मोहरा’ बनकर रह सकता है। उन्होंने कहा, “अगर इस डील से हमारे घरों में साफ पानी आता है, अस्पताल बनते हैं, तो यह अच्छा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि बड़े वादे अक्सर जमीन पर खोखले साबित होते हैं।”
स्थानीय एक्टिविस्ट जेंटिल मुलुमे का कहना है कि वॉशिंगटन में बैठे अधिकारी कांगो को एक ‘देश’ नहीं, बल्कि ‘कच्चे माल का गोदाम’ समझते हैं। उनका डर है कि अगर पर्यावरण के नियम सख्त नहीं हुए, तो खनन कंपनियां मुनाफा कमाकर निकल जाएंगी और पीछे छोड़ जाएंगी—प्रदूषित नदियाँ और बीमार बच्चे।
युद्ध और व्यापार का खतरनाक गठजोड़
पूर्वी कांगो में M23 जैसे विद्रोही गुटों का आतंक आज भी जारी है। तंगनिका प्रांत के एक्टिविस्ट चिराक इसा एक कड़वी सच्चाई बयां करते हैं: “जब युद्ध होता है, तो खनिजों की अवैध लूट सबसे आसान हो जाती है।”
डर यह है कि अमेरिका की इस नई दिलचस्पी से इलाके में हथियारों और ताकत का खेल और बढ़ सकता है। विभिन्न गुट खदानों पर कब्जा करने के लिए और ज्यादा खून-खराबा कर सकते हैं।
निष्कर्ष: सम्मान या सिर्फ सौदा?
कांगो के राष्ट्रपति फेलिक्स त्सेसीकेदी ने वादा किया है कि उनका देश अब अपनी “गरिमा और भविष्य” का सौदा नहीं करेगा। वे कहते हैं कि अब संसाधन वही बेचे जाएंगे जहां कांगो के लोगों को फायदा होगा।
लेकिन गोमा की खदानों में काम करने वाले मजदूरों की आँखों में उम्मीद कम और शक ज्यादा है। वे देख रहे हैं कि जिन पत्थरों को वे अपनी पीठ पर ढोते हैं, उनसे दुनिया भर की इलेक्ट्रिक कारें और स्मार्टफोन चल रहे हैं, लेकिन उनके अपने घरों में आज भी अंधेरा है।
वॉशिंगटन में चाहे जो भी दस्तावेज साइन हों, कांगो के आम आदमी का सवाल बस एक है—”क्या इस बार हमारी किस्मत बदलेगी, या सिर्फ हमारे मालिक बदलेंगे?”
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