नई दिल्ली, 30 मार्च: वैश्विक तेल बाजार में रविवार को तेज उछाल देखने को मिला, जब ब्रेंट क्रूड $116 प्रति बैरल के पार पहुंच गया। यह तेजी तब आई जब ईरान ने अमेरिका पर संभावित जमीनी कार्रवाई की तैयारी का आरोप लगाया, जिससे पहले से तनावग्रस्त ऊर्जा बाजारों में नई बेचैनी फैल गई।
बाजार की प्रतिक्रिया इतनी तेज इसलिए रही क्योंकि तेल व्यापारी सिर्फ सैन्य घटनाक्रम नहीं देख रहे, बल्कि यह भी देख रहे हैं कि उसका असर तेल सप्लाई पर क्या पड़ सकता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने का कोई भी संकेत तुरंत कच्चे तेल और गैस की आवाजाही को लेकर आशंका बढ़ा देता है।
यही वजह है कि इस बार कीमतों में उछाल किसी पक्के सप्लाई रुकावट की वजह से नहीं, बल्कि इस डर से आया है कि संघर्ष और गहरा सकता है। तेल बाजारों में कई बार सिर्फ आशंका ही कीमतों को ऊपर ले जाने के लिए काफी होती है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ फिर बाजार की चिंता का केंद्र बना
ताजा घबराहट के केंद्र में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल और LNG का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है, इसलिए खाड़ी में तनाव बढ़ते ही निवेशकों की नजर सबसे पहले इसी मार्ग पर जाती है।
भले ही अभी तक तेल निर्यात पूरी तरह बाधित नहीं हुआ हो, लेकिन शिपिंग में देरी, मार्ग बाधा, बीमा लागत और मालभाड़े में बढ़ोतरी का खतरा भी कीमतों को तेजी से ऊपर धकेल सकता है। यही वजह है कि बाजार ने किसी बड़े औपचारिक सप्लाई शटडाउन से पहले ही इतनी तेज प्रतिक्रिया दी है।
हालिया आकलनों से संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में शिपिंग और ऊर्जा प्रवाह पहले से दबाव में हैं। ऐसे हालात निवेशकों को पहले के खाड़ी संकटों की याद दिलाते हैं, जब बाजार ने वास्तविक सप्लाई लॉस से पहले ही घबराकर कीमतें ऊपर चढ़ा दी थीं।
भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए क्यों अहम है यह उछाल
भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, ऐसे झटकों को बेहद करीब से देखते हैं। तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आयात बिल, रुपये की स्थिति, मालभाड़ा, परिवहन लागत और महंगाई प्रबंधन तक पहुंच जाता है।
इसी वजह से नई दिल्ली भी इस तरह की चाल पर नजर रखती है। अगर तेल में तेजी थोड़े समय की हो, तो सरकारें और रिफाइनर कुछ हद तक उसे संभाल सकते हैं। लेकिन अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो उसका असर धीरे-धीरे व्यापक अर्थव्यवस्था पर दिखने लगता है — चाहे वह लॉजिस्टिक्स हो, एविएशन हो या घरेलू बजट।
फिलहाल बाजार निश्चितता पर नहीं, बल्कि जोखिम पर ट्रेड कर रहा है। लेकिन खाड़ी में तनाव बढ़ने पर तेल बाजार अक्सर पहले प्रतिक्रिया देता है और बाद में स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार करता है।
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