नई दिल्ली, 30 मार्च: लोकसभा ने इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक पारित कर दिया है। सरकार का कहना है कि इसका मकसद भारत की दिवालिया समाधान व्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों से बढ़ रही देरी, प्रक्रियागत अस्पष्टता और कानूनी अड़चनों को कम करना है। यह संशोधन इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 में बदलाव करता है — वह कानून जिसे मूल रूप से संकटग्रस्त कंपनियों के लिए समयबद्ध समाधान प्रक्रिया के तौर पर लाया गया था।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदन में विधेयक का बचाव करते हुए कहा कि संशोधन उन “व्याख्यात्मक विवादों” और प्रक्रियागत रुकावटों को दूर करने के लिए लाए गए हैं, जो समय के साथ मुकदमेबाजी और अलग-अलग व्याख्याओं के कारण बढ़ती गईं। यह विधेयक पहली बार अगस्त 2025 में लोकसभा में पेश किया गया था और बाद में चयन समिति के पास भेजा गया था। अब बजट सत्र के दौरान इसे पारित कर दिया गया है।
इन बदलावों की अहमियत इसलिए है क्योंकि IBC को कभी भारत के लिए ऐसे ढांचे के रूप में पेश किया गया था, जो खराब कर्ज और फंसी कंपनियों के मामलों को सालों तक खिंचने से रोकेगा। कानून के तहत कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी मामलों को 180 दिनों में निपटाने का लक्ष्य था, जिसे बढ़ाकर 270 दिन किया जा सकता था, और बाद में मुकदमेबाजी सहित अधिकतम सीमा 330 दिन तक मानी गई। लेकिन व्यवहार में कई मामले इससे कहीं ज्यादा लंबा समय लेते रहे। PRS के अनुसार, 30 जून 2025 तक जिन मामलों में रिजॉल्यूशन प्लान मंजूर हुआ, उन्हें औसतन 602 दिन लगे — यानी कानून की मूल समयसीमा से काफी ज्यादा।
आंकड़े बताते हैं कि सरकार पर बदलाव का दबाव क्यों बना
IBC में संशोधन की जरूरत सिर्फ कानूनी तकनीकी बदलाव का मामला नहीं थी। जून 2025 तक IBC के तहत कुल 8,492 कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) मामले स्वीकार किए जा चुके थे, PRS ने IBBI डेटा के आधार पर यह जानकारी दी है। इनमें से 1,905 मामले अभी भी लंबित थे, जबकि बाकी मामलों का निपटारा किसी न किसी रूप में हो चुका था।
लेकिन असली चिंता इस बात से जुड़ी है कि इन मामलों का अंत किस तरह हुआ। 6,587 बंद CIRP मामलों में से केवल 1,258 मामले (19%) ऐसे थे जिनमें मंजूरशुदा रिजॉल्यूशन प्लान आया, जबकि 2,824 मामले (43%) सीधे लिक्विडेशन में चले गए। इसके अलावा 1,191 मामले (18%) वापस ले लिए गए और 1,314 मामले (20%) अपील, समीक्षा या समझौते के जरिए बंद हुए। यानी व्यावहारिक स्तर पर कंपनियों को बचाने की तुलना में लिक्विडेशन ज्यादा बड़ा परिणाम बनकर उभरा — और यही IBC की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक रहा है।
देरी की समस्या भी गंभीर रही है। PRS के अनुसार, लंबित CIRP मामलों में से करीब 78% मामले 270 दिनों से ज्यादा समय से चल रहे थे। यानी कानून की “समयबद्ध” प्रकृति बार-बार ट्रिब्यूनल और मुकदमेबाजी के स्तर पर अटकती रही। PRS ने यह भी दर्ज किया कि दिसंबर 2024 तक राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में कुल 20,484 मामले लंबित थे, जिनमें 12,351 मामले IBC से जुड़े थे।
नया विधेयक असल में किन कमियों को ठीक करने की कोशिश कर रहा है
नए संशोधनों का एक बड़ा फोकस यह है कि इन्सॉल्वेंसी आवेदन जल्दी स्वीकार हों। हालिया रिपोर्टिंग में यह बात सामने आई है कि सरकार चाहती है कि अगर डिफॉल्ट साफ है, तो मामला शुरुआती स्तर पर ही लंबे समय तक अटका न रहे। क्योंकि किसी संकटग्रस्त कंपनी में सबसे ज्यादा वैल्यू अक्सर उसी समय खत्म होने लगती है, जब मामला अभी औपचारिक रूप से आगे बढ़ा ही नहीं होता।
विधेयक की सबसे अहम संरचनात्मक नई व्यवस्था Creditor-Initiated Insolvency Resolution Process (CIIRP) है। आसान भाषा में कहें तो यह कुछ चुनिंदा अधिसूचित वित्तीय लेनदारों को अदालत-आधारित पारंपरिक प्रक्रिया से पहले अधिक संरचित तरीके से समाधान शुरू करने का विकल्प देता है। PRS ने इसे विधेयक के बड़े बदलावों में गिना है। इसका उद्देश्य यह है कि मूल्य और समय दोनों को बचाया जा सके, खासकर उन मामलों में जहां देरी ही सबसे बड़ा नुकसान बन जाती है।
लिक्विडेशन प्रक्रिया में भी बदलाव किए गए हैं। विधेयक के तहत लिक्विडेटर के कुछ अधिकार — जैसे दावों को स्वीकार या खारिज करना और उनकी वैल्यू तय करना — सीमित किए गए हैं, जबकि Committee of Creditors (CoC) को लिक्विडेटर की नियुक्ति, हटाने और निगरानी में ज्यादा भूमिका दी गई है। इसके अलावा यह भी स्पष्ट किया गया है कि statutory dues को अपने-आप secured creditor का दर्जा नहीं मिलेगा। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि दावों की प्राथमिकता को लेकर विवाद कई मामलों में रिकवरी प्रक्रिया को उलझाते रहे हैं।
विधेयक cross-border insolvency के लिए भी रास्ता खोलता है, लेकिन PRS ने इस पर यह भी कहा है कि फिलहाल बिल में पूरा विस्तृत ढांचा नहीं दिया गया, बल्कि केंद्र सरकार को बाद में नियम बनाने की शक्ति दी गई है। यानी इस हिस्से में आगे और स्पष्टता आने की जरूरत रहेगी।
बैंक, होमबायर्स, MSME और रुकी परियोजनाओं के लिए यह क्यों बड़ा मुद्दा है
यह सिर्फ वकीलों और बैंकों का कानून नहीं है। IBC में देरी का असर सीधे बैंकों, होमबायर्स, डेवलपर्स, सप्लायर्स, MSME और कर्मचारियों तक पहुंचा है। जब कोई मामला बहुत लंबा खिंचता है, तो कंपनी की वैल्यू गिरती है, प्रोजेक्ट अधूरे रह जाते हैं और रिकवरी लगभग हर हितधारक के लिए कमजोर होती जाती है।
रियल एस्टेट इसका सबसे साफ उदाहरण है। वित्त मंत्री ने पिछले साल राज्यसभा में बताया था कि मार्च 2025 तक रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में कुल 1,522 इन्सॉल्वेंसी मामले स्वीकार किए गए थे, लेकिन इनमें से सिर्फ 204 मामलों का समाधान हो पाया था। वहीं, समाधान वाले मामलों में औसत रिकवरी 44.7% admitted claims के बराबर रही। इससे समझा जा सकता है कि रुकी हुई हाउसिंग परियोजनाओं में फंसे खरीदारों और बैंकों — दोनों की नजर इस कानून पर क्यों रहती है।
बैंकों के लिए तर्क साफ है: कोई खराब एसेट जितना ज्यादा समय कानूनी और प्रक्रियागत जाम में फंसा रहेगा, अंत में रिकवरी उतनी ही कमजोर होने की संभावना बढ़ेगी। PRS के अनुसार, जून 2025 तक IBC के तहत सुलझे मामलों में रिकवरी औसतन admitted claims का लगभग 33% रही, जबकि यह liquidation value का 171% थी। यानी कानून वैल्यू बचा सकता है — लेकिन तभी, जब वह समय पर चले।
MSME और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स के लिए यह मसला कई बार और भी ज्यादा तात्कालिक होता है। बड़े डिफॉल्टर के लंबे समय तक अटके रहने का सबसे ज्यादा असर अक्सर छोटे सप्लायर्स और सर्विस प्रोवाइडर्स पर पड़ता है। तेज एंट्री और ज्यादा अनुमानित रिजॉल्यूशन हर समस्या हल नहीं करेगा, लेकिन यह कम-से-कम देरी से फैलने वाले नुकसान को कम कर सकता है।
असली परीक्षा संसद के बाद शुरू होगी, संसद के भीतर खत्म नहीं
यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम बिंदु है। विधेयक का पारित होना राजनीतिक और आर्थिक रूप से जरूर बड़ा कदम है, लेकिन इससे यह अपने-आप तय नहीं हो जाता कि IBC अब अचानक तेज और प्रभावी हो जाएगा। असली सवाल यह है कि क्या ये संशोधन मुकदमेबाजी घटाएंगे, NCLT की कार्यक्षमता सुधारेंगे, आवेदन स्वीकार होने की देरी कम करेंगे और लिक्विडेशन की तुलना में वास्तविक समाधान की हिस्सेदारी बढ़ाएंगे।
दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार अब उस कानून की मरम्मत करने निकली है, जिसे कभी भारत के सबसे बड़े संरचनात्मक आर्थिक सुधारों में गिना गया था। संशोधन यह संकेत जरूर देते हैं कि नई दिल्ली को यह मानना पड़ा है कि सिस्टम को सुधारने की जरूरत है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या यह सुधार कागज से निकलकर व्यवहार में भी दिखेगा?
फिलहाल IBC एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है: अब बहस इस पर नहीं कि भारत को दिवालिया कानून चाहिए या नहीं, बल्कि इस पर है कि क्या देश आखिरकार इसे उसी रफ्तार से चला पाएगा, जिसका वादा शुरुआत में किया गया था।
Discover more from Enoxx News (Hindi)
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
