नई दिल्ली, 10 जनवरी, 2026 – रूस से मिलने वाले रियायती कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता अब एक नए मोड़ पर है। व्यापार आंकड़ों के ताजा विश्लेषण से संकेत मिलता है कि यदि भारत रूसी तेल के बजाय अमेरिका जैसे अन्य देशों से आयात बढ़ाता है, तो इसका भारत की अर्थव्यवस्था (राजकोषीय स्थिति) पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
घटता रूसी डिस्काउंट नवंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने रूस से $482.7 प्रति टन की दर से तेल आयात किया, जबकि वैश्विक औसत आयात लागत $498.8 प्रति टन थी। इसका मतलब है कि रूस से मिलने वाली छूट अब घटकर मात्र $16.1 प्रति टन रह गई है। 2022-23 के दौरान मिलने वाले भारी डिस्काउंट की तुलना में यह अब काफी कम है।
अमेरिकी तेल का विकल्प वहीं दूसरी ओर, अमेरिका से आयातित तेल की कीमत $523.3 प्रति टन रही। हालांकि यह वैश्विक औसत से $24.6 प्रति टन महंगा है, लेकिन रूसी और अमेरिकी तेल की कीमतों के बीच का अंतर इतना कम हो गया है कि सरकारी खजाने पर इसका बोझ बहुत सीमित होगा।
विशेषज्ञों की राय आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पहले से ही कम हैं। ऐसे में, अलग-अलग देशों से तेल खरीदने पर लगने वाले ‘प्रीमियम’ का कुल लागत पर बहुत मामूली असर पड़ता है। यह स्थिति भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय सुरक्षित और लचीले विकल्प चुनने की आजादी देती है।
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