शिमला, 15 मार्च — हिमाचल प्रदेश सरकार पालतू पशुओं को छोड़ने की बढ़ती घटनाओं पर रोक लगाने के लिए माइक्रोचिपिंग प्रणाली लागू करने की तैयारी कर रही है। इस व्यवस्था के तहत पालतू पशुओं की पहचान डिजिटल तरीके से की जाएगी ताकि उनके मालिकों का पता लगाया जा सके।
राज्य के पशुपालन विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस प्रणाली के लागू होने के बाद हर पालतू पशु को एक यूनिक पहचान नंबर से जोड़ा जाएगा। इससे किसी भी पशु के मिलने पर उसके मालिक का विवरण तुरंत पता लगाया जा सकेगा।
पशुओं की डिजिटल पहचान
माइक्रोचिप एक बेहद छोटी इलेक्ट्रॉनिक चिप होती है जिसे पशु की त्वचा के नीचे लगाया जाता है। इसमें एक विशेष पहचान संख्या होती है जिसे स्कैनर के माध्यम से पढ़ा जा सकता है।
स्कैन करने पर पशु के मालिक का नाम, पता और पंजीकरण से जुड़ी जानकारी सामने आ जाती है। इससे पालतू पशुओं को छोड़ने की घटनाओं में जिम्मेदारी तय करना आसान हो जाएगा।
यह तकनीक कई देशों में पहले से इस्तेमाल हो रही है और खोए हुए या छोड़े गए पशुओं की पहचान करने में काफी मददगार साबित हुई है।
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बढ़ती समस्या पर रोक लगाने की कोशिश
पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल के शहरों और पर्यटन स्थलों में पालतू पशुओं को छोड़ने के मामले सामने आए हैं। कई बार लोग स्थान बदलने या पशु की देखभाल में असमर्थ होने पर उन्हें सड़कों पर छोड़ देते हैं।
पशु कल्याण से जुड़े संगठनों ने इस समस्या को लेकर सरकार से सख्त कदम उठाने की मांग की थी। माइक्रोचिपिंग प्रणाली को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
स्थानीय निकायों की भी होगी भूमिका
योजना के तहत पशु चिकित्सालयों और अधिकृत केंद्रों में माइक्रोचिप लगाने की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है। नगर निगम और पंचायत स्तर पर भी पशुओं का पंजीकरण किया जाएगा।
इसके साथ ही लोगों को जिम्मेदार पालतू पशु पालन के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान भी चलाए जाने की संभावना है।
पशु कल्याण में सुधार की उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रोचिपिंग से पशुओं के टीकाकरण रिकॉर्ड और स्वास्थ्य निगरानी में भी मदद मिलेगी। इसके अलावा यह व्यवस्था आवारा पशुओं की संख्या को नियंत्रित करने में भी उपयोगी हो सकती है।
सरकार की योजना है कि चरणबद्ध तरीके से इस प्रणाली को पूरे राज्य में लागू किया जाए ताकि पशु कल्याण और जिम्मेदार पशुपालन को बढ़ावा दिया जा सके।
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