शिमला, 23 मार्च: मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू द्वारा पेश किया गया हिमाचल प्रदेश बजट 2026–27 कृषि और बागवानी, खासकर सेब अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखता है, लेकिन इसमें तात्कालिक राहत से अधिक दीर्घकालिक सुधारों पर जोर दिखाई देता है।
प्रदेश में बड़ी संख्या में लोग खेती पर निर्भर हैं, ऐसे में यह बजट ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अहम माना जा रहा है। इसमें कोई एक बड़ी घोषणा नहीं है, बल्कि कई छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम शामिल हैं जो लंबे समय में असर डाल सकते हैं।
- यह भी पढ़ें: हिमाचल बजट 2026: ₹54,928 करोड़ का प्लान, कल्याण और विकास के बीच वित्तीय संतुलन की चुनौती
सरकार ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की नीति जारी रखी है, जिससे किसानों की लागत कम करने का प्रयास किया जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में रासायनिक इनपुट महंगे पड़ते हैं, ऐसे में यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके साथ ही पुराने सेब बागानों की घटती उत्पादकता को देखते हुए रीजुवेनेशन प्रोग्राम पर भी जोर दिया गया है।
पिछले कुछ वर्षों में मौसम के बदलते पैटर्न का असर सेब उत्पादन पर पड़ा है, और इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सुधारात्मक कदमों पर ध्यान दिया है।
पोस्ट-हार्वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को भी इस बजट में प्राथमिकता दी गई है। कोल्ड स्टोरेज और सीए स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ परिवहन और लॉजिस्टिक्स सुधारने पर जोर दिया गया है। इससे किसानों को फसल को बेहतर समय पर बेचने का मौका मिल सकता है और उन्हें बेहतर कीमत मिल सकती है।
इसके अलावा डेयरी और पशुपालन के जरिए आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करने पर भी ध्यान दिया गया है। इससे किसानों की आय को स्थिर करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, बजट में सीधी आर्थिक राहत की कमी को लेकर चर्चा है। किसानों को उम्मीद थी कि कीमत स्थिरीकरण, सब्सिडी या कर्ज राहत जैसे बड़े कदम उठाए जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह राज्य की वित्तीय सीमाओं को दर्शाता है।
कुल मिलाकर, यह बजट किसानों के लिए तात्कालिक राहत की बजाय दीर्घकालिक सुधारों पर आधारित है। अब इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि योजनाएं जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू होती हैं।
Discover more from Enoxx News (Hindi)
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
