धर्मशाला/कांगड़ा – हिमाचल प्रदेश में विकास परियोजनाओं के चलते होने वाले विस्थापन (Displacement) को लेकर एक अजीब विरोधाभास सामने आया है। एक तरफ सरकार और प्रशासन कांगड़ा (गग्गल) एयरपोर्ट विस्तार की विस्थापन प्रक्रिया को देश भर के लिए एक “ग्रेट मॉडल” (Great Model) के रूप में पेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के हजारों ऐसे परिवार हैं जो दशकों पहले उजड़े थे, लेकिन आज तक बस नहीं पाए।
गग्गल: नया मॉडल, नई उम्मीद गग्गल एयरपोर्ट विस्तार के लिए जिन 14 गांवों की जमीन ली जा रही है, उनके लिए सरकार ने एक आकर्षक पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन (R&R) पैकेज तैयार किया है। मुआवजे की प्रक्रिया इतनी तेज और पारदर्शी रखी गई है कि इसे विस्थापन का एक सफल मॉडल माना जा रहा है। प्रशासन का दावा है कि प्रभावितों को उनकी जमीन और घर का उचित दाम दिया जा रहा है, ताकि वे अपना जीवन फिर से शुरू कर सकें।
पोंग और भाखड़ा: 50 साल का दर्द इसके ठीक उलट, पोंग बांध और भाखड़ा बांध के विस्थापितों की कहानी सरकारी सिस्टम की नाकामी का जीता-जागता सबूत है। 50 साल से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी ये लोग अपने अधिकारों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। पोंग विस्थापितों को राजस्थान में जमीनें (मुरब्बे) देने का वादा किया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। कई विस्थापितों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी अब बुजुर्ग हो चुकी है, लेकिन न्याय का इंतजार खत्म नहीं हुआ।
सवाल यह है कि अगर गग्गल के लिए सरकार इतनी संवेदनशील हो सकती है, तो उन पुराने जख्मों पर मरहम क्यों नहीं लगाया जा रहा जिन्होंने प्रदेश और देश को रोशन करने के लिए अपनी जमीनें कुर्बान कर दीं?
Discover more from Enoxx News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
