रीवा (मध्य प्रदेश): क्या “विकास” सिर्फ कागजों पर है? मध्य प्रदेश के रीवा जिले से आई एक तस्वीर ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह कहानी है मुलायम सिंह की, जो अपनी बीमार पत्नी की जान बचाने के लिए सिस्टम से लड़ते रहे, लेकिन हार गए।
ठेले पर जिंदगी और मौत का सफर रायपुर कर्चुलियान के रहने वाले मुलायम सिंह की पत्नी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्होंने एंबुलेंस के लिए गुहार लगाई, इंतजार किया, लेकिन कोई मदद नहीं पहुंची। पत्नी की सांसे उखड़ती देख, इस बुजुर्ग पति ने उन्हें लकड़ी के एक पुराने ठेले (Handcart) पर लिटाया और खुद धक्का लगाते हुए अस्पताल की ओर चल पड़े। यह सफर आसान नहीं था। जब तक वो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे, उनकी पत्नी दम तोड़ चुकी थीं। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
सिस्टम की संवेदनहीनता त्रासदी यहीं खत्म नहीं हुई। पत्नी की मौत के बाद, मुलायम सिंह को उम्मीद थी कि शायद अब अस्पताल प्रशासन शव वाहन (Hearse) दे देगा। लेकिन वहां भी निराशा हाथ लगी। आंसुओं और बेबसी के साथ, उन्हें अपनी पत्नी के शव को उसी ठेले पर रखकर वापस घर ले जाना पड़ा।
अधिकारियों का जवाब इस शर्मनाक घटना पर अधिकारियों का जवाब और भी चौंकाने वाला है। ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) ने कहा, “वो लोग देरी से आए थे, महिला की मौत हो चुकी थी। शव ले जाने के लिए उन्होंने हमसे गाड़ी नहीं मांगी।” सवाल यह है कि क्या एक शोकाकुल पति, जिसकी पत्नी अभी गुजरी हो, उससे यह उम्मीद की जाती है कि वो कागजी कार्रवाई करे? यह घटना बताती है कि ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाएं आज भी ‘वेंटिलेटर’ पर हैं।
Discover more from Enoxx News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
